अगले दिन सुबह का वक्त था।
मीरा राधिका के लैपटॉप पर बैठी अपने लिए कोई जॉब ढूँढ रही थी। एक के बाद एक वेबसाइट बदलते हुए अचानक उसकी नज़र एक पैराग्राफ पर जाकर ठहर गई।
उसमें लिखा था—
“India की सबसे बेहतरीन fashion designer, कीर्ति कपूर, को अपने लिए एक assistant की ज़रूरत है।”
मीरा कुछ पल के लिए स्क्रीन को देखती रह गई।
फिर खुद से धीमे से बोली,
“क्यों न मैं इसके लिए apply करूँ?”
फैशन डिज़ाइनिंग ही एक ऐसी चीज़ थी, जिसे वह दिल से करती थी—
खुशी से, जुनून से… और पूरे मन से।
ज़्यादा सोचे बिना उसने अपना resume खोला और उसी पल इंटरव्यू के लिए भेज दिया।
मेल भेजते ही उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई,
जैसे उसने कोई बड़ा कदम उठा लिया हो।
उधर, Kapoor Mansion में सुबह का माहौल हमेशा की तरह रौनक से भरा हुआ था।
डाइनिंग टेबल पर सब लोग बैठे नाश्ता कर रहे थे।
रणवीर अख़बार पढ़ रहा था,
कीर्ति कॉफ़ी की चुस्की लेते हुए किसी मैगज़ीन के पन्ने पलट रही थी,
राज और ध्रुव हमेशा की तरह हल्की-फुल्की नोकझोंक में लगे थे,
और माहिर मोबाइल में घुसा हुआ था।
बस एक कमी थी—
ओंकार और उनकी पत्नी गौरी वहाँ मौजूद नहीं थे।
दरअसल, कीर्ति के मम्मी-पापा किसी बड़े business problem की वजह से देश से बाहर गए हुए थे।
उनकी गैरमौजूदगी में भी कपूर मेंशन की रफ्तार कम नहीं हुई थी,
लेकिन कीर्ति के चेहरे पर हल्की-सी चिंता साफ़ झलक रही थी—
जो सिर्फ़ एक बेटी ही अपने माता-पिता के लिए महसूस कर सकती है। डाइनिंग टेबल के head chair पर आज भी हमेशा की तरह अशोक जी बैठे थे। शकुंतला जी एक-एक करके सबको प्यार से खाना परोस रही थीं। असल में, यह परिवार सिर्फ़ खून के रिश्तों से नहीं, प्यार के रिश्तो से भी जुड़ा था। अशोक जी के छोटे भाई वीर—
जो राज और ध्रुव के पिता थे—
एक भयानक कार एक्सीडेंट में दुनिया छोड़ गए थे।
वीर की मौत का सदमा इतना गहरा था कि
कुछ ही समय बाद उनकी माँ और उनकी पत्नी वीरा भी चल बसीं।
उस वक्त राज और ध्रुव बहुत छोटे थे,
इतने छोटे कि उन्हें ये भी ठीक से समझ नहीं आया था
कि ज़िंदगी उनसे क्या छीन कर ले गई है।
तभी अशोक जी और शकुंतला जी ने
उन दोनों को अपने पास रख लिया।
कभी यह महसूस नहीं होने दिया
कि वे उनके अपने बच्चे नहीं हैं। राज और ध्रुव को वही प्यार, वही डाँट,वही हक़ मिला जो घर के बाकी बच्चों को मिला करता था।
नाश्ता खत्म होते ही राजवीर ने नैपकिन साइड में रखा और सीधे कहा—
“मॉम, डैड… मुझे एक ज़रूरी काम से अभी जैसलमेर जाना है। हो सकता है कॉल न कर पाऊँ, रात को लौटूँगा।”
शकुंतला जी ने तुरंत टोका—
“फिर जा रहा है? दो दिन तो घर पर शांति से बैठ जाया कर। हर वक्त भाग-दौड़ ही लगी रहती है।”
इतने में कीर्ति मुस्कुराते हुए बीच में बोली—
“क्या यार ताई जी, आप भी न। आपको नहीं पता भैया कितने बिज़ी रहते हैं। इनके पास टाइम ही नहीं होता।”
फिर उसने राजवीर की तरफ़ देखते हुए हल्के तंज में कहा—
“वैसे भी भैया को प्यार सिर्फ़ एक ही चीज़ से है—
इंसान से छोड़ो… कंपनी से।
और वो भी अपनी मीटिंग्स से।”
टेबल पर हल्की-सी हँसी गूँज गई।
राज और ध्रुव ने एक-दूसरे की तरफ़ देखकर आँखों-ही-आँखों में मुस्कुरा दिया।
राजवीर ने कीर्ति को घूरते हुए कहा—
“बहुत बोलने लगी है आजकल।”
कीर्ति ने तुरंत जवाब दिया “सच कड़वा होता है, भैया।”
अशोक जी ने शांत आवाज़ में कहा “काम ज़रूरी है तो जाओ, लेकिन ध्यान रखना। और हाँ, रात तक आ सको तो अच्छा रहेगा।”
राजवीर ने सिर हिलाया—“जी, कोशिश करूँगा।”इतना कहकर वह उठ खड़ा हुआ।राजवीर मेंशन से निकल चुका था और ध्रुव भी अस्पताल के लिए रवाना हो गया। घर में अब वही रोज़मर्रा की ख़ामोशी और हलचल थी—हर कोई अपने-अपने काम में busy था।
उधर कीर्ति अपने कमरे में बेड पर बैठी लैपटॉप खोले, उन लोगों की लिस्ट देख रही थी जिन्होंने उसकी असिस्टेंट की पोस्ट के लिए अप्लाई किया था। ध्यान से profile scroll करते हुए उसने तीन–चार नाम shortlist किए।
फिर उसने अपने एक employee को call किया“मैं अभी एक list भेज रही हूँ। इन सबको कॉल करके बता देना कि ये लोग इंटरव्यू के लिए सेलेक्ट हो गए हैं।”
इतना कहकर उसने कॉल कट किया।
कीर्ति ने लैपटॉप साइड में रखा और उठकर अपने ड्रेस कलेक्शन की तरफ़ चली गई। पूरा रूम उसके डिज़ाइनों से सजा था—कपड़े, स्केच, फैब्रिक्स… हर चीज़ में उसकी मेहनत और क्रिएटिविटी झलक रही थी।
उसने रैक से एक ख़ूबसूरत dress निकाली—soft fabric, perfect cut और elegant design ये उसकी new collection में से ही एक थी।
ड्रेस पहनकर वह आईने के सामने खड़ी हो गई।
हल्की-सी मुस्कान उसके होंठों पर आ गई। उसने खुद को ऊपर से नीचे तक देखा, बाल ठीक किए और मन ही मन सोचा“perfect।”

वहीं दूसरी तरफ़ राजवीर की फ़्लाइट एयरपोर्ट पर लैंड हो चुकी थी। उसने बाहर निकलते ही अपनी कार ली और जैसलमेर की तरफ़ रवाना हो गया।
शहर पीछे छूटता चला गया और रास्ता धीरे-धीरे घने जंगल में बदल गया। चारों तरफ़ ऊँचे पेड़, सन्नाटा और बीच-बीच में सुनसान सड़क—इस रास्ते पर गाड़ियाँ भी बहुत कम चल रही थीं।
राजवीर ड्राइव कर ही रहा था कि अचानक—
कार झटके से रुक गई।
उसने एक बार फिर स्टार्ट करने की कोशिश की…
कुछ नहीं हुआ।
राजवीर ने स्टीयरिंग पर हाथ मारते हुए झुँझलाकर कहा—
“What the hell! इसे अभी ही बंद होना था?”
वह कार से बाहर उतरा, चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं, न कोई गाड़ी। बस जंगल की खामोशी और हवा की सरसराहट।
उसने बोनट खोला, मगर उसे खुद भी ज़्यादा मैकेनिकल नॉलेज नहीं था।
मोबाइल निकाला—
नेटवर्क नहीं। वह बोनट पर हाथ रख check कर रहा था।

रणवीर ने कार के अंदर से पानी की बोतल निकाली और जंगल की तरफ़ बढ़ गया। कुछ दूर चलते ही उसकी नज़र एक तालाब पर पड़ी। उसने सोचा यहीं से पानी भर लेता हूँ।
जैसे ही वह तालाब के पास पहुँचा—
उसे अचानक अपने पीछे किसी की मौजूदगी का एहसास हुआ।
रणवीर ने पलटकर देखने का मौका भी ठीक से नहीं पाया था कि
एक तेज़ वार उसकी तरफ़ आया।
वह झट से नीचे झुका और हमले से बाल-बाल बच गया। उसने देखा—सामने खड़ा शख़्स अपने चेहरे को सफ़ेद कपड़े से ढके हुए था और हाथ में तलवार थी।
एक के बाद एक हमले होते गए।
रणवीर पूरी फुर्ती से बचता रहा।
अचानक सही मौका पाकर उसने सामने वाले का हाथ पकड़ा, उसे पीछे की ओर मरोड़ा और एक झटके में दीवार से लगा दिया।

अब दोनों आमने-सामने थे। और एक दूसरे की आंखों में देख रहे थे। सफ़ेद कपड़े के पीछे छुपी आँखें
बेहद ख़ूबसूरत थीं,
लेकिन उनमें गुस्सा साफ़ झलक रहा था।
इसी पल
रणवीर समझ गया—
यह कोई आदमी नहीं…
यह एक लड़की थी।
हवा कुछ पल के लिए थम-सी गई।
जंगल की ख़ामोशी में बस उनकी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।



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