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नौकरानी

अगली सुबह

जब दिशा सो कर उठी तो उस ने देखा कि वो कल रात की तरह बिना कपडो के लेटी हुई है। उस ने अपने आप को blanket से cover करा और bathroom की तरफ चली गई। आज रात विशंभर रुद्र के मेंशन आने वाला था। दिशा तैयार हो कर जब नीचे आई तो उस की नजर dining table पर बैठे रुद्र पर गई। वो जैसे ही उस के पास गई तो रुद्र ने उस को बिना देखे कहा खाना खा लो क्योंकि उसके बाद तुम्हें पूरे घर की सफाई करनी है। इस पर दिशा ने बस हा मैं गर्दन हिला दी, और खाना खाने लगी। रूद्र ने अपना खाना खत्म करा और उठ कर बोला अच्छे से तैयार हो जाना क्योंकि तुम्हारा वो बाप आज रात आ रहा है।

जैसे ही दिशा ने ये सुना की उसके बडे पाप आ रहे है। उसके चेहरे पर एक उम्मीद की किरण आई। रुद्र ने उस की तरफ देखा और कहा खुश मत हो आखिर किसे पता उस की गाडी का accident हो जाए। दिशा ने उसको देखा और नाम आंखों से कहा please उन्हें कुछ मत करना।

रुद्र ने अपना black coat उठाया और बाहर की तरफ जाते हुए बोला मुझे पूरा मेंशन साफ चाहिए समझी।

दिशा ने फटाफट खाना खाया और मेंशन को साफ करने लगी। करीब चार घंटे सफाई करने के बाद वह वापस से कमरे में गई। उसके सारे कपडे गंदे हो गए थे। उसने अलमारी में से एक लाल रंग की साडी निकली जो शायद से उसी के लिए वहां रखी गई थी।

दिशा ने अपने गंदे कपडे उतारे और जैसे ही उसने लाल रंग की साडी अपने बदन पर लपेटी, उसके चेहरे पर एक अलग ही तेज आ गया। साडी सिल्क की थी, हल्की और बेहद खूबसूरत। उसके बॉर्डर पर सुनहरे धागों की कढाई थी जो दिशा की सादगी में भी एक शाही आभा जोड रही थी। उसने हल्के से बाल खोल दिए और अपनी मांग में एक छोटी सी बिंदी लगा ली। आईने में खुद को देख कर उसे एक पल को अपनी पुरानी जिंदगी की याद आई – जब वो अपने घर में बेफिक्री से हँसा करती थी।

वो तैयार होकर सीधा किचन में गई। उसके चेहरे पर अब सिर्फ एक ही चिंता थी – विशंभर के लिए सब कुछ परफेक्ट हो। वो जानती थी कि रुद्र जैसा भी हो, लेकिन विशंभर का सामना आसान नहीं होगा।

उसने सब्जियों को काटना शुरू किया – आलू, गोभी, मटर और गाजर। फिर मसाले तैयार किए – पिसा हुआ धनिया, हल्दी, लाल मिर्च और गरम मसाला। उसने पुलाव के लिए चावल भिगो दिए और एक तरफ रोटियाँ सेंकने की तैयारी की।

वो पूरे मन से खाना बना रही थी, जैसे उसमें अपनी भावनाएँ भी मिला रही हो – डर, उम्मीद, थकान और थोडी सी खुशी। कढाई में जब मसालों की खुशबू फैली, तो पूरे मेंशन में एक अपनापन महसूस हुआ।

उसे खाना बनाते हुए पूरे दो घंटे हो गए। अब शाम के चार बज चुके थे। सुबह से अब तक उसने बस नाश्ता किया था, और फिर कुछ नहीं खाया। लेकिन उसके चेहरे पर थकान के साथ एक अलग ही उम्मीद थी।

अब वो बस इंतजार कर रही थी... शाम ढलने का... और आंखों में एक उम्मीद थी कि शायद वह अब वापस जा सके"

शाम के ठीक सात बजे, रुद्र ऑफिस से वापस मेंशन में आया। मेंशन के दरवाजे से भीतर कदम रखते ही उसकी तेज चाल, चमकदार काले जूतों की आवाज और उस पर पहना हुआ ब्लैक सूट एक बार फिर उसकी सख्त और डरावनी मौजूदगी को जाहिर कर रहे थे।

जैसे ही उसने ड्राइंग Room की ओर कदम बढाए, उसकी नजर एक पल को दिशा पर पडी — जो रसोई से बाहर निकल कर हाल के पास खडी थी। उसने लाल साडी पहनी हुई थी, हल्की सी पसीने की बूंदें उसकी कनपटियों से लुढक रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में शांति थी। रुद्र ने उसे देखा और बिना कोई reaction दिए सीधे अपने कमरे की ओर मुड गया।

दिशा ने सोचा कि शायद आज का दिन यूं ही बीत जाएगा... मगर तभी रुद्र का कदम दरवाजे से पहले रुक गया। वह अचानक पलटा और वापस उसके पास आया। उसकी आंखों में वही पुराना तेवर था, मगर होंठों पर एक हल्की सी शातिर मुस्कान भी थी।

खाना बन गया?

दिशा ने sir नीचे झुकाए हुए गर्दन हिलाई –" हां..."

रुद्र थोडी देर तक उसे देखता रहा, फिर बिना कुछ कहे अपने कमरे की ओर चला गया।

लगभग आधे घंटे बाद, मेंशन के गेट से एक काली कार अंदर आई। ड्राइवर ने दरवाजा खोला और विशंभर बाहर निकले। उनकी चाल में थकावट थी, आँखों में डर और माथे पर शिकन।

वो नर्वस थे – बहुत नर्वस।

कैसी होगी दिशा?

क्या उसने मुझे माफ किया होगा?

कहीं वो अब मुझसे नफरत तो नहीं करती?

उनका दिल धडक रहा था।

वो जानते थे कि उन्होंने अपना फर्ज नहीं निभाया

वो जैसे ही मेंशन के दरवाजे के भीतर आए, उनकी नजर सबसे पहले ड्राइंग Room के सोफे पर बैठे रुद्र पर पडी। रुद्र लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था, लेकिन उसकी आँखें अब विशंभर की तरफ उठ चुकी थीं।

दोनों की नजरें मिलीं।

रुद्र ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा,

तो आ ही गए आप..."

विशंभर ने ठंडी सांस ली और धीमे स्वर में कहा,

हाँ... और उम्मीद करता हूँ कि आज कुछ जवाब भी मिलेंगे..."

अब आगे क्या हो सकता है?

क्या दिशा विशंभर से मिलेगी?

क्या रुद्र कोई चाल चलने वाला है?

अरे अरे रुकिए मेरी एक और कहानी है जरा उसका कुछ हिसा सुनकर जाएगा।

दिलवालों का शहर है ये दिल्ली, कहते हैं यहां सब का दिल बहुत बडा है, इस दिल वालों की दिल्ली में रहता है एक अट्ठाईस साल का नौजवान लडका राजेश्वर मित्तल का इकलौता बेटा अर्णव मित्तल, जिसकी जिंदगी में प्यार तो मानो है ही नहीं; जिंदगी भर मानो इसे काम ही करना है। आईए जानते हैं इस नौजवान की कहानी पर उसके लिए हमें पहले जाना पडेगा उसके ऑफिस में।

मित्तल कॉरपोरेशन

इंडिया की टॉप दस बेस्ट मैनजमेंट कंपनी मैं सबसे ऊपर है। पर आज ऑफिस का माहौल थोडा गरम था, क्योंकि इनके रक्षक करण नहीं आए थे। करण अर्णव का असिस्टेंट और दोस्त था जो हर किसी को उनके बॉस के गुस्से से बचा लेता था। पर आज लगता है वह लेट हो गया क्योंकि अरनव पहले ही ऑफिस में बैठा था। तभी अचानक से लिफ्ट खुली और उसमें से अट्ठाईस साल का एक लडका बाहर निकला जिसने चेहरे पर नजर काचश्मा लगा रखा था। उसने पहले सभी को देखा और फिर समझ गया कि आज लगता है वह लेट हो गया है।

करण फटाफट से अर्णव के ऑफिस की तरफ चला गया, जैसे ही उसने गेट खोल तो उसकी नजर समने बैठे अर्णव पर गई जिसने white shirt and black paint पहनी हुई थी और लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था जिसे देखने से पता चल रहा था कि वह इस वक्त बहुत सीरियस है। उसके चेहरे के सख्त भाव भी उसे बेहद Attractive बना रहे थे। करण चुपचाप उसे लडके के सामने जाकर खडा हो गया और बोला Sorry sir माफ कर दीजिए मैं लेट हो गया।

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