05

ये मेरा घर हे

रुद्र ने डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए विशंभर की ओर देखा और एक बनावटी मुस्कान के साथ कहा,

आईए, बैठिए... खाना ठंडा हो जाएगा।

फिर उसने एक गिलास में पानी डालते हुए हल्के मगर तंज भरे लहजे में कहा,

जरा रुकिए... मैं अपनी' पत्नी' को भी बुला लाता हूँ। आखिर इस घर की मालकिन को मेहमानों की सेवा करनी चाहिए, है ना?

विशंभर ने यह बात सुनी तो उसका चेहरा और ज्यादा कठोर हो गया। उसकी मुट्ठियाँ धीरे- धीरे भींच गईं। उसके भीतर एक तूफान उमड रहा था। उसने अपने गुस्से को दबाया। वह कुछ कहना चाहता था, कुछ करना चाहता था... लेकिन कर नहीं सकता था।

उधर, दिशा अपने कमरे में खिडकी के पास बैठी थी। आंखें लाल थीं, चेहरे पर थकावट और मन में कई उलझे हुए सवाल। वह खुद को थोडा सामान्य करने की कोशिश कर रही थी, तभी रुद्र की भारी और तिरस्कार से भरी आवाज गूंजती है,

दिशा! नीचे आओ!

उसकी आवाज में कोई स्नेह नहीं था। बस हुक्म था। जैसे कोई नौकर को बुलाता है।

दिशा के हाथ काँप उठे। उसने जल्दी से साडी की पल्लू ठीक की, चेहरे पर पानी छिडका और हडबडाते हुए सीढियों की तरफ दौडी। जैसे ही वह नीचे पहुंची, रुद्र ने उसे देखते ही व्यंग्य से कहा,

क्या हुआ? बडी भक्तिन बनकर भागती चली आ रही हो... मैं कौन सा तुम्हें खा रहा हु?

उसकी आवाज में वह कडवाहट और तंज था जो दिल को चीर देता है।

दिशा की नजर डाइनिंग टेबल पर बैठे विशंभर से मिली। उसकी आंखों में एक उम्मीद थी, एक बेबसी — जैसे कह रही हो“ बडे पापा... कुछ तो कहिए, कुछ तो कीजिए...”

वो धीरे- धीरे उनकी तरफ एक कदम ही बढा पाई थी कि अचानक रुद्र ने उसके हाथ को कसकर पकड लिया।

उसकी पकड में गुस्सा था, अधिकार था और उस सख्ती की झलक, जिससे दिशा की आंखों में पानी भर आया।

रुद्र ने उसे अपनी ओर खींचते हुए गुस्से में कहा,

तुम्हें नहीं पता इस घर में कैसे रहना है? यह तुम्हारे बाप का घर नहीं है... ये मेरा घर है, और यहाँ वही होगा जो मैं कहूंगा।

दिशा की आंखों में आंसू आ चुके थे, मगर उसने कुछ नहीं कहा।

विशंभर ने यह दृश्य देखा... और उसका खून खौल उठा। मगर फिर भी वह वहीं बैठा रहा — जुबान जैसे बंद हो चुकी थी। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी नजरें झुकाईं और बहुत धीमे स्वर में कहा,

दिशा... बेटा, खाना परोस दो।

वो ‘बेटा’ शब्द आज उसके गले में फंसा हुआ था। उसमें दर्द था, पश्चाताप था और एक ऐसा बोझ जिसे वह सालों से ढोता आ रहा था।

दिशा ने रुद्र की पकड से खुद को धीरे से छुडाया, sir हिलाया और किचन की ओर चली गई — अपनी आंखों में आंसुओं को रोकते हुए, अपने जज्बातों को भीतर समेटते हुए... सिर्फ एक ‘पत्नी’ की तरह नहीं, बल्कि एक ‘बेटी’ की तरह जिसे अपनों ने ही अकेला छोड दिया था।

दिशा किचन से थाल में खाना लेकर धीरे- धीरे डाइनिंग एरिया की ओर चली। थाल में गरमा- गरम रोटियाँ, सब्जी, पुलाव और दाल थी। उसके हाथ काँप रहे थे, लेकिन चेहरे पर एक सूनापन था। वह सबसे पहले विशंभर के पास पहुँची और बिना कुछ कहे, चुपचाप थाली आगे बढाई।

विशंभर ने उसकी आँखों में देखा — वहाँ एक गहरा दर्द था, और उससे भी ज्यादा... एक मौन सवाल।

लेकिन ठीक तभी, रुद्र ने गुस्से में भरकर उसका हाथ कस के पकड लिया। थाली का एक कोना कांप गया, और एक रोटी लगभग गिरते- गिरते बची।

तुम भूल गई हो क्या? तुम्हारा पति मैं हूं!

सबसे पहले मुझे खाना परोसना चाहिए था, ना कि इस बूढे को!

उसकी आवाज में हुक्म भी था, अपमान भी और एक बेहद खौफनाक अधिकार।

दिशा ने कुछ नहीं कहा। बस हल्के से sir झुकाया और थाली को वापस सीधा करते हुए, वही खाना रुद्र के सामने लाकर रख दिया। वह जानती थी कि जवाब देने का मतलब है और ज्यादा अपमान, और शायद कुछ और बुर हो जाए।

विशंभर यह सब देख रहा था... और फिर भी खामोश था। उसे बार- बार याद आ रहा था अपने दोस्त को किया हुआ वादा वह वादा जिसमें उसने उसकी बेटी का ध्यान रखेगा। रुद्र ने खाना शुरू किया। दिशा फिर से विशंभर के पास गई और उसके लिए एक दूसरी थाली परोस दी।

कुछ देर की चुप्पी के बाद, विशंभर ने कांपती आवाज में कहा,

बेटा... तुमने कुछ खाया नहीं। चलो, अब बैठो। मेरे साथ खाना खाओ।

दिशा ने उसकी ओर देखा, उसकी आंखें भर आईं। इन दो दिनों में किसी ने भी उससे प्यार से बात नहीं करी थी। लेकिन जैसे ही वो बैठने के लिए आगे बढी, रुद्र की तेज आवाज हवा में गूंज गई:

खाएगी... क्यों नहीं खाएगी? लेकिन यहां नहीं रसोई में, जमीन पर बैठेगी और वहीं खाना खाएगी!

उसकी आवाज में क्रूरता थी। हर शब्द दिशा के आत्मसम्मान पर हथौडे की तरह वार कर रहा था। विशंभर ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

पर... ऐसा क्यों? ये ठीक नहीं है। देखो रुद्र, तुम गलत समझ रहे हो। दिशा..."

उसने आगे कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन रुद्र की नजरें अब आग बरसा रही थीं।

अगर जिंदा रहना चाहते हो, तो चुपचाप अपना खाना खाओ...!

उसकी यह धमकी हवा में बर्फ जैसी जम गई।

विशंभर का चेहरा पीला पड गया। वो जानता था, रुद्र Kiss हद तक जा सकता है।

दिशा ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी थाली उठाई और चुपचाप रसोई की ओर चली गई। वहां फर्श पर एक कोने में बैठ गई — दीवार से पीठ टिकाए, और आँखों में आँसू रोके हुए। एक- एक निवाला जैसे गले से उतर ही नहीं रहा था, लेकिन फिर भी उसने खुद को जबरन खाने पर मजबूर किया।

क्या विशंभर अब भी चुप रहेगा, या कुछ कदम उठाएगा?

क्या दिशा अब अपनी चुप्पी तोडेगी?

या कोई तीसरा किरदार कहानी में आने वाला है?

मेरी दूसरी कहानी मोहब्बत है तुमसे की झलक।

अब तक अर्णव नींद में बार- बार मुस्कान का नाम ले रहा था। मुस्कान तुम कहां हो लौट आओ मैं कभी तुम्हें हर्ट नहीं करूंगा वापस आ जाओ मुस्कान वापस आ जाओ दुनिया भर की खुशी तुम्हारे नाम कर दूंगा, फिर अचानक से उठ कर बैठ गया। चाहे कुछ भी हो जाए अबकी बार हमारे प्यार की कहानी अधूरी नहीं रहेगी। इस कहानी को पूरा होना ही पडेगा अब चाहे कोई कुछ भी कर ले मैं तुम्हें ढूंढ कर अपना बना लूंगा।

इस वक्त अरनव की आंखों में एक अलग ही जुनून था। जिसमें साफ- साफ देखा जा सकता था। कि अब भगवान भी आकर उसे उसकी मुस्कान से अलग नहीं कर सकते।

करण बेसब्री से अपने आदमी के call का इंतजार कर रहा था। तभी उसका फोन बज उठता है। phone पर उसे आदमी ने कहा Boss मैंने पता कर लिया है। अर्णव sir ने जिस लडकी को देखा था वो और कोई नहीं मुस्कान mam थी। इस बात को सुनकर करण की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने उसको Ok कहा और खुशी के मारे कूदने लगा।

तभी उसके दिमाग में आया अगर भाभी जिंदा है तो वो आई क्यों नहीं मुझे उनसे बात करनी होगी अर्णव को बताने से पहले मैं उनसे बात करूंगा। इस वक्त रात के तीन बज रहे थे। करण ने सोचा वो सुबह- सु

बह बिना अर्णव को बताएं मुस्कान से मिलने जाएगा और पूरा मामला समझे गा

Write a comment ...

Write a comment ...