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पुरानी सच्चाई

विशंभर और रुद्र अब मेंशन के एक कोने में बने उस बडे से स्टडी Room में आमने- सामने बैठे थे। कमरे की दीवारों पर पुरानी किताबों की लंबी अलमारियाँ थीं और बीच में एक बडी सी मेज, जिस पर रुद्र का लैपटॉप और कुछ फाइलें फैली हुई थीं। कमरे में हल्का अंधेरा था, बस एक टेबल लैम्प जल रहा था, जो रुद्र की चेहरे की तीखी परछाईं बना रहा था।

रुद्र अपनी आरामदायक रिवॉल्विंग चेयर पर टेक लगाकर बैठा था, आँखों में वही घमंड, वही ठंडापन। सामने विशंभर, था।

रुद्र ने आँखें सिकोडते हुए बोला,

तो बोलो विशंभर जी... आज बडी तलब लग गई मिलने की? कल ही तो तुम्हारी' बेटी' की शादी हुई है मुझसे... अब इतनी बेचैनी क्यों हो रही है उसे देखने की?

उसकी आवाज में ताना था, चुभन थी। जिसे हर शब्द चाकू बनकर विशंभर के सीने में उतर रहा हो।

विशंभर ने गहरी सांस ली, अपनी उंगलियों को आपस में भींचते हुए बोला,

रुद्र... तुम जो कर रहा है ना, वो गलत है। बहुत गलत। मैं मानता हूँ, गलती मेरी थी... बहुत बडी गलती। पर दिशा एक मासूम बच्ची है। उसका कोई कसूर नहीं है उस दो साल पुराने हादसे में।

रुद्र एक पल के लिए चुप रहा, फिर हँस पडा haaaaa haaa वो हँसी जिसमें, सिर्फ जहर था।

रुद्र के चेहरे पर एक टेढी मुस्कान उभरी। उसने जोर से कुर्सी की बाँह पकडी और धीरे से आगे झुकते हुए कहा,

मासूम? तुम उस शब्द की कीमत भी जानते हो?

जो तुम लोगों ने किया था वो मैं आज तक नहीं भूला हूं। तुम्हारी वजह से तुम्हारे उस बेटे की वजह से और उसे लडकी की वजह से हमारे परिवार ने बहुत कुछ झेला।

विशंभर ने उसे देखकर कहा बडी बहन है वह तुम्हारी याद रखो कोई लडकी नहीं है। रूद्र ने गुस्से में विशंभर को देखा और कहा बहन होती तो शादी से नहीं भगति तुम्हारे उसे खटिया बेटे के साथ। तुम जानते थे तुम शुरुआत से जानते थे।

Flashback

प्रताप हवेली रौशनी से जगमगा रही थी। हर कोना फूलों से सजा था। शहनाइयों की गूंज और मेहमानों की हँसी से पूरा महल जैसे जश्न में डूबा हुआ था। लेकिन उस भव्य आयोजन के बीच, एक कमरा ऐसा भी था जहां सन्नाटा पसरा हुआ था।

नंदिनी, लाल लहंगे में दुल्हन बनी, शीशे के सामने बैठी थी। उसकी आँखें नम थीं, होंठ कांप रहे थे। दोस्त उसे सजा कर जा चुकी थी, लेकिन वो अब भी स्थिर बैठी थी... जैसे मन और तन दोनों जकडे हुए हों।

तभी कमरे की खिडकी से एक परछाईं अंदर आई।

नंदिनी का दिल धडक उठा। उसने शीशे में देखा — एक सत्ताईस साल का नौजवान, गहरे भावुक चेहरे के साथ, बाल कुछ बिखरे हुए, सफेद शर्ट और काली पैंट में खडा था।

सौरभ..."

उसके मुंह से बस यही नाम निकला।

वो झट से खडी हुई और सौरभ की ओर बढ गई। सौरभ ने उसके चेहरे को दोनों हाथों में भरकर कहा,

चलो... अब और नहीं सह सकता मैं। मैंने पापा को सब कुछ बता दिया है। वो हमारी मदद करेंगे। हम आज रात ही यहाँ से दूर चले जाएंगे। अपनी दुनिया बनाएंगे — हमारी दुनिया।

नंदिनी की आंखों से आँसू बह निकले।

सौरभ... लेकिन पापा...?

सौरभ ने प्यार से उसके आँसू पोछते हुए कहा,

कुछ नहीं होगा। हम कुछ साल बाद वापस आएंगे... उन्हें मना लेंगे। पापा ने खुद मुझसे कहा है — अगर तुमसे इतना ही प्यार है, तो मैं तुम्हें इस मोहब्बत की सजा नहीं दूँगा। वो हमारी मदद करेंगे। हमें देश से बाहर भेज देंगे, एक नई शुरुआत के लिए।

फिर उसने नंदिनी का हाथ उसके पेट पर रखा और फुसफुसाया,

हमारी दुनिया में सिर्फ तुम, मैं और हमारा ये प्यारा सा बेबी होगा।

नंदिनी रो पडी। लेकिन इस बार वो आंसू डर के नहीं थे उम्मीद के थे। वो सौरभ का हाथ थामकर उसके साथ चली गई।

कुछ समय बाद

जब लालिता जी कमरे में आईं, नंदिनी वहां नहीं थी — बस एक खत पडा था। उन्होंने उसे कांपते हाथों से उठाया उसने लिखा था।

>" माँ, मैं जा रही हूं... मैं शादी नहीं कर सकती। मैं सौरभ से प्यार करती हूं। और एक सच बता रही हूं — मैं प्रेग्नेंट हूं। मैं किसी और की जिंदगी बर्बाद नहीं कर सकती। प्लीज, पापा को समझा देना... माफ करना माँ।

लालिता जी वहीँ जमीन पर धडाम से बैठ गईं।

रुद्र दौडता हुआ आया,

माँ? What happened? दीदी कहां है?

लालिता जी ने काँपते हाथों से वो चिट्ठी रुद्र को थमा दी। रुद्र ने चिट्ठी पढी — उसकी आंखें फैल गईं, दिल बुरी तरह धडकने लगा।

दी...दीदी... प्रेग्नेंट...?

उसने माँ को बेड पर लेटाया, उनके हाथ- पैर सहलाए, चेहरे पर पानी के छींटे मारे। कुछ मिनट बाद जब माँ को होश आया, उन्होंने काँपते हुए कहा,

अब क्या होगा, रुद्र... सब कुछ खत्म हो गया... विक्रम जी... उन्हें कैसे बताऊं?

रुद्र उन्हें संभाल ही रहा था कि हवेली के नीचे मंडप में हलचल मच गई।

मंडप पर बैठे गुप्ता जी के बेटे वरुण को नंदिनी का दूल्हा बनाया गया था — उसकी आंखें अब सबके सामने शर्म से झुकी हुई थीं। तभी अचानक, पूरी हवेली की बत्ती चली गई — और एक बडी स्क्रीन पर एक वीडियो चलने लगा।

वो वीडियो कुछ ही घंटे पुराना था — सौरभ और नंदिनी की बातचीत, उनका भागने का प्लान, सब... सब सामने था।

लोग फुसफुसाने लगे।

कहां गई दुल्हन?

भाग गई किसी के साथ...!

वो भी शादी के दिन...!

विक्रम प्रताप सिंह — रुद्र के पिता — जो उस वक्त मंच के पास खडे थे, यह सब देखकर वहीं गिर पडे। डॉक्टर बुलाया गया... उन्हें Heart अटैक आया था।

Hospital में अफरा- तफरी मच गई थी।

विक्रम की हालत नाजुक थी। उसी समय उनके बिजनेस में गिरावट शुरू हो गई। कंपनी के शेयर लगातार गिरने लगे। रुद्र का बडा भाई नील, जो विदेश में था, उसे तुरंत वापस बुलाया गया। वो बिजनेस संभालने लगा और रुद्र Hospital में माँ- बाप के बीच फंसा रहा — जिम्मेदारियों में, गुस्से में, और सबसे ज्यादा... बहन के दर्द में।

Flash back end

रुद्र की आंखें जल रही थीं, गुस्से और पुराने जख्मों से भरी हुईं।

अब तुम समझे, विशंभर?

तुम्हारे बेटे की मोहब्बत की कीमत हमने अपने खून से चुकाई है। और अब तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारी' दूसरी बेटी' — दिशा — को चैन से जीने दूं?

नहीं... कभी नहीं।

विशंभर कुछ नहीं कह पाया। उसका सच अब गले में अटक गया था।

एक ओर वो दिशा को बचाना चाहता था, दूसरी ओर रुद्र की नफरत का तूफान सब कुछ लीलने को तैयार था।

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